5 अगस्त 2020,अयोध्या,उत्तर प्रदेश में करोड़ो लोगों की आस्था के प्रतीक श्रीराम जन्मभूमि के मंदिर का पांच सौ वर्षों के बाद पुनः निर्माण हो रहा है। श्रीराम करोड़ो संतातन धर्मी लोगों के आराध्य हैं। वह पुरुषों में मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।वह सत्य ,निष्ठा व आदर्श के प्रतीक हैं। भारत की आत्मा में रमें हुए हैं श्रीराम।  उठते बैठते,चलते फिरते,उत्सव,पर्व पर भारत के जन के भगवान हैं श्रीराम। इसीलिए राम -राम,जय राम जी की करते हैं भारत के  लोग। जन्म से लेकर मृत्यु तक राम का नाम  लिया जाता है , राम नाम सत्य है,सत्य बोलो गत है। यहां राम नाम घट- घट के स्वामी के लिए सम्बोधित किया जाता है। राम नाम  सास्वत है,सनातन है। वह नाम  त्याग, तपस्या, मर्यादा व आदर्श का प्रतीक है।   भारतीय संस्कृति में श्रीराम का आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। 
भारतीय सनातन परम्परा में अनेक महापुरुषों ने अवतार लिया है। उनका अवतार ही इसलिए होता है ,जब जब पृथ्वी पर अन्याय,पाप अत्याधिक बाद जाता है। तब -तब भगवान मनुष्य के रूप में धरती पर अवतार लेकर दुष्टों का संहार करते है और धर्म की पुनः स्थापना करते है तथा संत जनों को भय मुक्त करते हैं। उन्हीं राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम का अपना ही महत्व है।
 जब तक भारत पर विदेशी आक्रांताओं की कुदृष्टि  नहीं पड़ी थी,तब तक सभी कुछ ठीक ठाक चलता रहा।जब सातवीं शताब्दी के बाद विदेशी हमलावरों ने भारत पर हमले कर भारतीय संस्कृति को पददलित करने लगे और  भारत की आत्मा पर चोट करने लगे । विदेशी हमलावरों का  कोई सिद्धान्त नहीं था। उनकी दृष्टि में या तो इस्लाम स्वीकार करो ,नहीं तो मार दिए जाओगे। इसी सिद्धान्त  को लेकर उन्होंने  7 वीं शताब्दी से अनेक विदेशी हमलावरों ने हमले कर भारतीय प्रजा पर घोर अत्याचार किये। उनके  आराध्यों के मंदिरों ,भवनों  को धर्म के नाम पर विध्वंश किया । एक के बाद एक नर पिशाचों ने  सोने की चिड़िया कहलाने वाले भारत जो खूब लूटा और बरबाद किया। उनके धर्म में काफिरों के लिए किसी प्रकार की दया व मानवता का कोई स्थान नहीं था। उन बर्बर लोगों के आक्रमणों से अयोध्या में भगवान श्रीराम जी का मंदिर भी अछूता नहीं रहा। ऐसा नहीं है कि यहां के लोगों ने उनसे संघर्ष नहीं किया,बल्कि पांच सौ वर्षों तक बराबर संघर्ष करते रहे। उन संघर्षों की लंबी दास्तां हैं  । कोई भी विदेशी आक्रांता कभी भी समस्त भारत पर राज नहीं कर  पाया। जबकि सम्पूर्ण भारत पर समय समय पर सम्राट युधिष्ठिर, सम्राट विक्रमादित्य, सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य इत्यादि ने  शासन किया। सातवीं  शताब्दी  के अंत में  अरब के मोहम्मद बिन कासिम ने भारत पर  हमला किया और उसने हज़ारों लोगों का कत्ल किया और जबरन बलात्कार व धर्म परिवर्तन किये तथा हज़ारों मंदिरों को  तोड़ा। ऐसे ही नौ खलीफाओं ने सन 1638 ई0 से लेकर सन 711 ई0 तक पन्द्रह बार भारत पर हमले किये और हिन्दुओं  को भारी नुकसान पहुँचाया। सन  1001 ई0 से सन 1026 ई0 तक महमूद गजनवी ने सत्रह बार भारत पर हमले किये । उसने भी बड़ी कत्लों गारद मचाई। उसने गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर को तोड़ा और  अनेक मंदिरों को तोड़  कर अपने साथ आपार धन संपत्ति  ले गया । उसके बाद मुहमम्द गौरी ने सन 1175 ई0 से सन 1194 ई0 तक भारत पर भयानक हमले किये ।उसने भी हज़ारों लोगों का कत्ल किया और महिलाओं से बर्बर बलात्कार  किये। उसने हजारो लोगों का धर्म परिवर्तन किया  और अनेक मंदिरो  को भूमिसात किया । सन 1206 ई0 से लेकर 1290 ई0 तक गुलाम वंश के सुल्तानों ने भी भारत के लोगों पर अमानुषिक कार्य किये  और जम कर यहां के लोगो को लूटा और मंदिरों व भवनों  को विध्वंस किया। सन 1290 ई0 से लेकर सन 1320 ई0 तक खिलजी वंश के अल्लाउद्दीन खिलजी व अन्य ने भी भारत की जनता पर घोर अत्याचार किये। उसने भी वही किया जो उससे पूर्व के हमलावरों ने धर्म के नाम पर किया था। फिर सैय्यद वंश ने सन 1451 ई0 से लेकर सन 1451ई0 तक वही किया। फिर लोधी वंश ने सन 1451 ई0  से सन 1426 ई0 तक भारत की जनता पर जुल्म ढाए।
उसके बाद मुगल वंश ने भारत में अपने शासन काल में बड़े जुल्म किये । उसका  मूल पुरुष चंगेज़ खान मंगोलिया का रहने वाला बड़ा क्रूर व्यक्ति था। उसके वंश में तैमूर लंग ने सन 1369 ई0 में समरकंद का सुल्तान बन गया। वह बड़ा जालिम था I  उसने दिल्ली तक कत्लेआम मचाया और लूटपाट करके  वापिस लौट गया।  उसके भतीजे बाबर ने अपने चाचा से समरकंद छीनने की कोशिश की। किंतु वह पराजित हो गया। अनेक बार मुंह की खाने के बाद  बाबर भारत  की ओर बड़ा। उसने भारत पर हमला किया और कत्लोगारद करता हुआ  दिल्ली पहुँच गया। उसने भी भारत में हज़ारों लोगों को मारा,धर्मपरिवर्तन किया।उसने उत्तर भारत के अनेक मंदिरों को विध्वंश किया और उन्हें जमकर लूटा।  बाबर के आदेश से 21 मार्च 1528 ई0 को उसके सेनापति मीर बांकी ने हिन्दुओ के आराध्य अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि पर स्थित  भव्य मंदिर को तोड़ कर भूमिसात कर दिया और उसके स्थान पर एक मस्जिद बना दी गई और उसने उसका नाम बाबरी मस्जिद  रख दिया। श्रीराम का विशाल मंदिर ईसा पूर्व 57 वर्ष पहले सम्राट विक्रमादित्य ने उसे  बनवाया था। यह सीधे सीधे भारत की आत्मा पर चोट की गई थी।उसके उस कृत्य से  हिन्दू जनता का हृदय कराह  उठा  और इसीलिए वे  समय  समय पर   प्रतिशोध करते रहे। बाबर के बाद हुमायूं , अकबर,जाहांगीर , शाहजहाँ , और जालिम औरंगजेब ने  भी अपने अपने शासन काल में  वही सब कुछ किया ,जो उसके पूर्ववर्ती आक्रांताओ  ने किया था । उन्होंने हत्याएं ,धर्म परिवर्तन ,बलात्कार  किये और मंदिरों को विध्वंश किया । परन्तु श्रीराम की जन्मभूमि को मुक्त करवाने के लिए हिन्दुओं ने सतत्त  500 वर्षो तक 76 युद्ध किये । हिन्दुओं ने अनेक बार उस में विजय हासिल की , परन्तु फिर मुस्लिम सुल्तानों के द्वारा उन्हें पराजित कर पुनः अधिकार कर लिया  गया ।श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए भीती राज्य के  राजा महताब सिंह, हंसवर राज्य के राजा रणविजय सिंह , रानी जयराज कुंवरी  इत्यादि अनेक लोग थे । सन 1530 ई० से  1556 ई० तक दस बार श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए हिन्दुओं ने युद्ध किये । सन 1556 ई० से 1605 ई० तक अकबर के शासन काल में बीस बार युद्ध किये गये । अकबर के नवरत्नों में बीरबल और टोडरमल की राय से बाबरी मस्जिद ढांचे के साथ चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की आज्ञा दी थी । परन्तु कट्टर औरंगजेब के शासन काल में तीस बार श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए हिन्दुओं ने युद्ध किये । औरंगजेब के काल में पूरे भारत में हजारों मंदिरों को तोडा गया और उसने अयोध्या में भी अनेक मंदिरों को ढहाया । सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी निहंगो की एक सेना को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए भेजा था

सन 1751 -52 ई० तक इंदौर के धनगर मराठा सरदार मल्हार राव होलकर , अवध के नवाब सफदरजंग की सहायता के लिए रूहेलखंड, बंगश प्रदेश और अवध(वर्तमान के उत्तर प्रदेश ) में अभियान किये और उन्हें बहुत मार मारी तथा रुहेले, बंगश पठान सम्पूर्ण प्रदेश को छोड़ कर चिलकिया पहाडियों व् हिमालय की तलहटी की और भाग गये ।
अवध और इलाहाबाद में पठानों  के अत्याचारों से बदले की प्यास से झुलसते हुए मराठो ने बंगश प्रदेश और रूहेला प्रदेश से पूर्ण प्रतिशोध लिया , जो उनके पूर्वजो ने भारत की जनता के साथ किया था । प्रसिद्ध इतिहासकार आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने अवध के दो नवाब  पुस्तक में  लिखा है कि ” मल्हार  राव होलकर ने अवध  के नवाब से मांग की थी कि  फैजाबाद (अयोध्या ), इलाहाबाद (प्रयाग ) और बनारस (काशी ) के हिन्दू तीर्थ स्थान मराठो को सौप दिए जाएँ । यह ऐसी  मांग थी कि अवध का नवाब सफदरजंग ईमानदारी से  पूरी पूरी निश्चिन्ता से स्वीकृत नहीं कर  सकता  था , इसलिए वह  ताल मटोल की निति अपनाता रहा  ।”  
इस विषय में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दू पद पादशाही में  लिखा है कि  ” महाराष्ट्र मंडल के नेताओं ने एक बार पुनः अवध के नवाब व दिल्ली के वजीर से पुण्यधाम काशी (बनारस ), तीर्थराज प्रयाग(इलाहाबाद ) व अयोध्या ( फैजाबाद ) को प्राप्त करने का प्रयास किया ।  वे हिन्दू स्वाधीनता  आंदोलन के  प्रतिनिधि थे । अत : हिन्दुओं के पुनीत धामों  पर मुस्लिम प्रभुत्व की पताकाएं अभी भी फहराती हुई देखकर उनके ह्रदय  में शूल सा कसमसाता  रहता था ।  मराठो ने इन धर्म स्थानों  की मुक्ति का सतत प्रयास किया । जब  कूटनीतिक माध्यमों से लक्ष्य पूर्ण होता दिखाई नहीं दिया तो मल्हार राव होलकर अधीर हो उठे । उन्होंने निश्चय किया कि  मैं पवित्र  देव स्थानों  पर खड़ी  मस्जिदों  को ध्वस्त कर हिन्दू धर्म के अपमान के स्मारकों को  सदैव  के लिए  समाप्त  कर दूंगा । क्योंकि  हिन्दुओं के  पवित्रतम मंदिर ध्वंसावशेषों  पर खड़ी   हुई मस्जिद उन दुर्भाग्य के दिनों  का स्मरण दिलाती रहती थीं , जब मुस्लिम पताका हिन्दू जाति   के श्रद्धा  केन्द्रों पर  फहराई गई थीं । ” परन्तु दुर्भाग्य  है  हिन्दू जाति  का , उनकी उस योजना का पता काशी के ब्राह्मणों  को लग गया और वे मल्हार राव होलकर के पास आकर याचना करने लगे कि  आप ऐसा नहीं करें । आपके जाने के पश्चात्  यवनों से हमारी कौन रक्षा  करेगा ।जब तक कोई शुभ घडी उपस्थित न हो जाए, तब तक के लिए  अपनी इस योजना को क्रियात्मक रूप ना दें । अपने प्राणों के भय से इस पुनीत कार्य  को और राष्ट्रीय अपमान का प्रतिशोध लेने से रोक कर हम पाप के भगीदार बन  रहे है । मल्हार राव होलकर  ने उन्हें बहुत समझाया परन्तु वे नहीं माने ।  होलकर ने  कहा कि  आज की यह भूल , भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगी ।    उसी बीच पेशवा तक यह बात पहुंचा दी गई थी कि मल्हार राव होलकर  मस्जिद तोडकर पुन : मंदिर  बनाने की योजना बना रहे  हैं ।  पेशवा ने कहा अभी  आप यह कार्य नहीं करें । इसलिए मल्हार राव होलकर  को उस नेक कार्य को बीच  में ही टालना पडा । अवध के नवाब सफदरजंग ने उनकी नाराज़गी दूर करने के लिए चापलूसी करते हुए मल्हार राव होलकर को कोइल (अलीगढ ) से लेकर कड़ा (इलाहाबाद ) तक का  प्रदेश  जागीर स्वरूप सौंप दिया  और दिल्ली के बादशाह ने  भी मल्हार राव होलकर को खुश करने के लिए अलग से चान्दवाड  का जिला सौंप  दिया I 
आगे चलकर अयोध्या  के राम जन्मभूमि मंदिर विवाद  को हल करने के लिए अवध के नवाब सआदतअली  ने रोज रोज की लड़ाइयों से तंग आकर मुसलामानों  के साथ साथ हिन्दुओं को भी पूजा अर्चना  का  अधिकार दे दिया ।सन 1853 ई०  में राम जन्मभूमि  को लेकर  अयोध्या में साम्प्रदायिक  दंगा हुआ । सन 1859 में  अंग्रेजों ने विवादित स्थल पर बाड  लगा दी  और हिन्दू और मुसलामानों को पूजा व नमाज  की इजाजत दे दी । महंत रघुबर दास ने राम जन्मभूमि लेने का  प्रयास किया ।  परन्तु बाधा आने पर  वह फैजाबाद  की अदालत में मंदिर निर्माण के लिए गये ।  इस विषय पर अदालत  का रवैया  भी दुलमुल  रहा ।  सन 1949 ई०  को वहां हिन्दुओं  ने भगवान् श्रीराम की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू कर दी । विवाद के बाद सरकार ने वहां ताला  लगा दिया । सन 1986 ई० में फैजाबाद जिला न्यायधीश ने हिन्दुओं  के पक्ष में पर ताला खोलने का आदेश दिया  । समय प्रधानमंत्री  राजीव गाँधी  की सरकार थी । उसके विरोध मुसलमानों ने   मे बाबरी एक्शन कमेठी का गठन किया । कोर्ट  ने मामला अपने पास  मंगवा लिया Iसन 1989ई० में  राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए विश्व हिन्दू परिषद् ने आन्दोलन शुरू कर दिया । भारतीय जनता पार्टी ने भी उसमें सहयोगी की भूमिका निभाई और लाल कृष्ण आडवाणी ने राममंदिर मुक्ति के लिए रथ यात्रा शुरू की । जिससे मंदिर  आन्दोलन को भारी सफलता मिली । सन 30 अक्तूबर 1990 ई० को अयोध्या में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह  यादव ने कार सेवको पर  गोलियां चलवाई । जिसमें  लगभग डेढ़ दर्जन कार सेवक मारे गये । जिससे हिन्दू समाज और  उद्देलित हो गया ।
6 दिसम्बर 1992  ई० को हज़ारो कार सेवकों ने 500 वर्षो पुराने कलंक बाबरी ढांचे  को तोड़ कर धो डाला ।  30  सितम्बर 2010  को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तीनों पक्षों रामलला विराजमान , निर्मोही अखाड़ा  और सुन्नी वक्ख बोर्ड के बीच सम्पत्ति  को बांटते  हुए फैसला सुनाया ।  इससे कोई भी पक्ष  राजी नहीं हुआ और विवाद चलता रहा  और अंत में  सुप्रीम कोर्ट ने 9  नवम्बर 2019 ई० को  मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने रामलला के पक्ष  में फैसला सुनाया  और दूसरे पक्ष  को पांच एकड़ भूमि कहीं दूर मस्जिद बनाने के लिए दी गई ।
दिनांक 5  अगस्त 2020  ई०  करोड़ों  हिन्दुओं  के आराध्य  प्रभु श्रीराम  की जन्मभूमि पर 500 वर्षों के  सतत  संघर्ष  के बाद पुन : अयोध्या में श्रीराम भूमि  पर मंदिर बनाने के लिए भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी  ने पहली ईंट रखकर श्रीराम  मंदिर  का शुभारम्भ किया   जिसके करोडो  लोग इसके  साक्षी बनें । संध्या समय भारत में हिन्दुओ ने  अपने घरों पर  दीपक जलाएं ।          जय श्रीराम 

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