पानीपत युद्ध
14 जनवरी 1761
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बलिदान दिवस

आज से लगभग 260 वर्ष पूर्व 14 जनवरी 1761 ईo को मराठो और काबुल, अफगानिस्तान के अहमदशाह अब्दाली के बीच 14 जनवरी 1761 ईo को पानीपत में घमासान लड़ाई हुई थी। जिसने भारत का भौगोलिक इतिहास ही बदल डाला। यदि उस युद्ध में मराठे जीत जाते तो ना तो आज का पाकिस्तान और बांग्लादेश होता और ना ही वर्तमान में अलगाववादियों की चुनौतियां ही मिलती।

सन 1664 ईo में छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता और हिन्दू संस्कृति की रक्षा के लिए हिन्दू पद पादशाही व स्वराज्य की स्थापना की और मराठा राज्य की नींव डाली। जालिम बादशाह औरंगजेब उस प्रबल मराठा शक्ति को कभी दबा नहीं पाया।बल्कि वह स्वयं ही कब्र में दफन हो गया।

मराठा शक्ति के आगे भारत के बड़े -बड़े राज्य नतमस्तक होते चले गए। जो शिवाजी महाराज कभी दक्षिण से उत्तर भारत तक नहीं आ सके। उनके स्वराज्य के पदचिन्हों पर बाद में चलकर  पूरे भारत पर, पेशवा, होलकर, सिंधिया, गायकवाड, भौसले, पंवार आदि ने  विशाल मराठा साम्राज्य ही खड़ा कर दिया।विशेषकर उत्तर भारत में इंदौर के धनगर(गडरिया) मराठा  सरदार मल्हार राव होलकर ने मुगल, पठान, राजपूत व जाटों से चौथ(कर) वसूल किया। मराठे सम्पूर्ण भारत से चौथ, सरदेशमुखी वसूल करते थे। उस समय मराठों को छोड़कर अन्य सभी में राष्ट्रीयता की कमी थी । मराठे जाति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित सर्वोपरि मानते थे। जबकि राजपूत, जाट, रुहेले, बंगश आदि पठान व्यक्तिगत लाभ के लिए देश को भी ताख  पर रखने की सोच रखते थे । पठानों का हिंदुस्तान में अपनी सत्ता कायम करने के सपनों पर सन 1751ईo में दोआब( उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड) में मल्हार राव होलकर और सिंधिया ने उन्हें पराजित कर पानी फेर दिया था । जब वे मराठों को किसी भी सूरत में जीत नहीं पाए,तो नजीबाबाद के नजीब खान रुहेला, अवध के शुजाउद्दौला, जयपुर के माधौसिंह कछवाहा, मारवाड़ के विजय सिंह राठौड़ इत्यादि  ने काबुल के अहमदशाह अब्दाली को निमंत्रण देकर बुलाया था।

 दिसम्बर 1751 ईo में काबुल के अहमदशाह अब्दाली ने हिंदुस्तान पर हमले करने करने शुरू किए और उसने   मार्च 1752 ईo में मुगल सूबेदार मीन मन्नू को हरा दिया तथा मीन मन्नू ने लाहौर  और मुल्तान देकर उससे संधि कर ली।  दिल्ली के वजीर सफदरजंग ने अब्दाली के आक्रमण के समय मराठों  से रक्षा की अप्रेल 1752 ईo को संधि कर ली। वजीर को मालूम था कि जब हिंदुस्तान पर अब्दाली का आक्रमण होगा तो सारे रुहेले और बंगश पठान उसके साथ मिल जाएंगे। संधि के अनुसार  मराठे पठानों व अन्य राजाओं से दिल्ली के बादशाह की रक्षा करेंगे।  संधि के अनुसार मराठो को पंजाब,सिंध के( स्यालकोट,पसरूर,गुजरात और औरंगाबाद के जिलों सहित)  और दोआब (हिसार, संभल, मुरादाबाद और बदायूं)  पर चौथ लगाने का अधिकार होगा। पेशवा को आगरा और अजमेर की सूबेदारी दी जाएगी तथा दिल्ली का बादशाह 50 लाख रुपये मराठों को देगा। जब इस संधि को बादशाह से मंजूरी करवाने के लिए मल्हारराव होलकर और वजीर सफदरजंग दिल्ली पहुंचे, तो उनके पहुंचने से पूर्व ही दिल्ली के बादशाह ने 23 अप्रेल  को अब्दली से संधि कर ली। इस पर मल्हार राव होलकर को बादशाह पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने दिल्ली के आसपास के सभी इलाकों बादली, रेवाड़ी पर कब्जा कर , वहां से बलपूर्वक कर वसूल किया। उसी बीच पूना के पेशवा ने मल्हार राव होलकर को खबर भेजी की वह गाजीउद्दीन के लिए बादशाह से दक्षिण की सूबेदारी का खरिता दिलवाकर  उसे साथ लेकर दक्षिण पहुंचे।  14 मई  1752 ईo को मल्हारराव होलकर दक्षिण के लिए रवाना हो गए। उसके बाद मल्हार राव होल्कर अनेक घटनाओं में व्यस्त रहे। जिसके कारण उन्हें कई युद्ध भी लड़ने पड़े।

अब्दाली ने अपने पुत्र तैमूर शाह और सेनापति जहानखां को हिंदुस्तान पर हमला करने को भेजा और अब्दाली स्वयं उनके पीछे -पीछे चलता रहा। तैमूर शाह ने दिसम्बर 1756 ईo को मुगल सूबेदार अदिना बेग को हराकर लाहौर पर अधिकार कर लिया। अब्दाली की सेनाएं लूटमार करती हुई सरहिंद तक पहुँच गई। दिल्ली के वजीर गाजीउद्दीन ने मराठो को निमंत्रण भेजा कि वे जल्दी से उनकी रक्षार्थ आएं। दिसम्बर 1756 ईo में मल्हार राव होलकर और रघुनाथ राव ने पठानों के विरुद्ध कूंच किया। उससे पूर्व अब्दाली लूटमार करता हुआ आया और 28 फरवरी ,1757 ईo को उसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। दिल्ली के वजीर ने अब्दाली के आगे समर्पण कर दिया। उसने दिल्ली में भारी नरसंहार किया और उसने पंजाब,दिल्ली मथुरा तक अधिकार कर लिया और वह लूटमार,हत्या,बलात्कार,मंदिरों का विध्वंश कर लूट का माल लेकर वापिस चला गया। मराठे उस अवसर पर चूक गए। केवल ग्वालियर से अंताजी मानकेश्वर सौ सैनिकों के साथ दिल्ली की ओर लपका और उसने दिल्ली में फंसे मराठा परिवारों को निकालने के लिए बिजली की तरह झपट्टा मारा और गुरिल्ला लड़ाई लड़कर अपने साथियों को सुरक्षित निकाल कर ले गया। उसने मथुरा पहुँच कर भरतपुर के सूरजमल जाट से कहा कि हम दोनों मिलकर अब्दाली को भगा सकते हैं।परंतु जाट राजा ने अब्दाली से लड़ने से साफ इंकार कर दिया और सीधे भरतपुर की ओर चला गया। बाद में जब अब्दाली ने मथुरा पर आक्रमण किया तो जाट राजा ने उससे युद्ध किया। 1 अप्रेल 1757 ईo को अब्दाली 12 करोड़ की संपत्ति और चार हज़ार औरतों को साथ ले गया । उसने दिल्ली में गाजीउद्दीन को वजीर और नजीब खान रुहेला को मीर बक्शी बना दिया। अब्दाली ने रास्ते में उसने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को तोड़कर भूमिसात कर दिया। अब्दाली अपने पुत्र तैमूर और सेनापति जहान खां को लाहौर में पंजाब की सुरक्षा के लिए छोड़ कर , स्वयं वापिस काबुल चला गया।

उस अवसर पर मराठे चूक गए और उन्हें आने में देर हो गई। दिल्ली पहुँचकर बादशाह से मराठा सरदार मल्हार राव होलकर ने कर की मांग की । कर नहीं देने पर मराठों ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया और 6 सितंबर 1757 ईo को मराठों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। मल्हार राव होलकर ने अहमद खां बंगश को नजीब खां की जगह मीर बक्शी बना दिया।
फिर मल्हारराव होलकर और रघुनाथ राव पंजाब की ओर आगे बढे और उन्होंने रोहतक,करनाल,तिलोरी, कुंजपुरा,थानेश्वर पर अधिकार कर लिया तथा नजीब खां और अब्दाली के आदमियों को मार भगाया। मार्च 1758 ईo में उन्होंने सरहिंद पर भी कब्जा कर लिया ।अब्दाली का आदमी अब्दुल समद खां वहां से जान बचाकर भाग गया। सरहिंद पर होलकर और रघुनाथ द्वारा अधिकार की खबर सुनकर अब्दाली का पुत्र तैमूर शाह और सेनापति जहान खां जान बचाकर लाहौर छोड़कर भाग गये और रावी नदी के उस पार 19 अप्रेल 1758 ईo को उन्होने वहां डेरे लगाए। 20 अप्रेल 1758 ईo को मल्हार राव होलकर और रघुनाथ राव ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। उन्होंने भागती हुई अफगान सेना का पीछा किया और उन्हें मार- मार कर गिराना शरू किया। पठान भयभीत होकर भाग रहे थे और मराठो ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और वे उन्हें मारते हुए रावी नदी को पार कर गए। तैमूर शाह ने रुक कर लड़ने का साहस नहीं किया और वह आगे की ओर भागता रहा। मराठे अफगानों का पीछा करते हुए चिनाव नदी तक पहुंच गए ,तब उन्होंने अपने घोड़ो की लगामें खींची। यह मराठा पराक्रम के उत्कर्ष की चरम सीमा थी। अब्दाली के पुत्र तैमूर की घोर पराजय हुई थी।

मल्हारराव होलकर और रघुनाथ राव वहां एक महीना ही ठहरे और 14 जून 1758 ईo को वापिस चले आए। तुकोजी होलकर और खंडोजी कदम वहां छावनी डाल कर रहने लगे। बाद में रघुनाथ राव ने विट्ठल शिवदेव और जनकोजी सिंधिया ने सबाजी शिंदे को वहां भेजा।लेकिन यह सेना पठानों को रोकने के लिए बहुत कम थी।पठानों ने विद्रोह किया तो तुकोजी राव होलकर ने अक्टूबर 1758 ईo को उन्हें फिर शिकस्त दी और उन्हें मारते हुए झेलम नदी को पार किया और फिर भागते अफगानों का पीछा करते हुए अटक नदी पार की । वहां जाकर उन्होंने अपने घोड़ो की लगामें खींची और अटक पर मराठो ने भगवा ध्वज गाड़ दिया। वहां बहुत ज्यादा ठंड पड़ती थी । इसलिए वहां मराठे छः महीने ही ठहरे और थोड़ी सी सेना छोड़कर वपिस आ गए।
पंजाब में मराठा सत्ता को कायम रखने के लिए मई 1759 ईo में राजपुताना (राजस्थान) से दत्ताजी सिंधिया को वहां भेजा। शामली पहुंचकर नजीब खां रुहेला से सन्धिवार्ता शुरू हुई। नजीब खां सन्धिवार्ता की आड़ में अहमदशाह अब्दाली को हिंदुस्तान पर हमला करने के लिए निमंत्रण भेजता रहा। उधर अब्दाली ने फिर पंजाब पर हमलें शुरू किये और वह दिल्ली की ओर बढ़ने लगा। जनवरी 1760 ईo को अचानक यमुना के पूर्वी तक बुराड़ी घाट पर नजीबखान रुहेला ने दत्ता जी सिंधिया पर हमला करके उसे मार डाला। उनके भाई जनकोजी सिंधिया घायल हो गए । पंजाब से मराठों की सत्ता उखड़ गई और सारे पंजाब पर अब्दाली का फिर कब्जा हो गया।
अहमदशाह अब्दाली के आगमन तक मराठा सरदारों को अलग अलग फँसाए रखने की जयपुर के माधौसिंह कछवाहा की नीति के कारण हुआ।अब्दाली की सहायता से मराठों को नर्मदा के दक्षिण में भगा देने के षड्यंत्र में नजीब खां रुहेला और माधोसिंह कछवाहा दो प्रमुख षडयंत्र कारी थे।अतः यह स्वाभाविक ही था कि अपने उद्देश्य की पूर्ति तक लिए उसने मल्हार राव होलकर को राजपूताना में फंसाए रख कर दत्ताजी सिंधिया की सहायता के लिए पहुंचने की उनकी योजना को असफल कर दिया। नवम्बर 1759 ईo को मल्हारराव होलकर जयपुर से युद्ध में उलझे हुए थे। मल्हार राव होलकर को 27 दिसम्बर 1759 ईo को दत्ताजी सिंधिया का पत्र मिला कि आप तुरंत मेरी सहायता को चले आओ। क्योंकि अहमदशाह अब्दाली से जल्दी युद्ध होने वाला है। मल्हार राव होल्कर जयपुर से युद्ध को बीच मे ही छोड़कर दत्ताजी सिंधिया की सहायता को तेजी से चल दिये। जब मल्हारराव होलकर 15 जनवरी 1760 ईo को कोटपुतली नामक स्थान पर पहुंचे तो रास्ते मे घायल जनकोजी सिंधिया, महादजी सिंधिया और भागे हुए मराठा सैनिक मिले। वहां उन्हें पता चला कि दत्ताजी सिंधिया युद्ध मे मारे गए हैं।

अब्दाली 14 जनवरी 1760 ईo को दिल्ली में पहुँच गया और  उसने अपने दूत के द्वारा खबर भिजवाई की जयपुर के माधौसिंह कछवाहा, मारवाड़ के विजय सिंह राठौड, अवध के शुजाउद्दौला तथा भरतपुर के सूरजमल जाट खिराज लेकर  

स्वयं उपस्थित हों। अब्दाली ने सूरजमल जाट से एक करोड़ की मांग की। सूरजमल ने कहा -मैं एक साधारण जमींदार हूँ। मैं दिल्ली की वैधानिक सरकार को निश्चित समय पर निश्चित पेशकश भुगतान करने के लिए सदैव तैयार हूँ। यदि आप पहले मराठों को दिल्ली से निकाल दें और स्वयं हिंदुस्तान में रुक कर राज सिंहासन ग्रहण कर लें, तो मैं आपको अपना स्वामी स्वीकार करने को तैयार हूं।
उधर मल्हार राव होलकर ने सूरजमल जाट प्रार्थना की कि आप अब्दाली के विरुद्ध एक सशक्त अभियान में सहायता करें ।परन्तु सूरजमल जाट ने कहा-जब तक दक्षिण से पर्याप्त सैनिक सहायता नहीं मिले,तब तक आपको छापामार युद्ध जारी रखना चाहिए। मल्हार राव होलकर ने जाट राजा से स्वयं इस युद्ध में शामिल होने का प्रस्ताव रखा।इस पर सूरजमल जाट ने कड़े रुख के साथ स्पष्ट कहा- जहां तक मेरी स्थिति का प्रश्न है,मेरे पास जमकर निर्णायक युद्ध लड़ने के लिए पर्याप्त सैनिक क्षमता का अभाव है। मैं छापामार झड़पों में भाग लेने के लिए अपने देश की सीमाओं से बाहर भी नहीं जा सकता । यदि इतने पर भी शाह अब्दाली ने मेरे ऊपर आक्रमण किया,तो मैं अपने दुर्गों के भीतर ही रहकर यथा साध्य रक्षा करने का प्रयास करूँगा।
मल्हारराव होलकर ने अकेले ही दम पर अब्दाली को मात देने की ठान ली और 3 फरवरी 1760 ईo को अपनी सेना के न लड़ने वाले सवारों और परिवारों को चंबल के उस पार भेज दिया और उन्होंने छापामार युद्ध कर अब्दाली को परेसान कर डाला। 28 फरवरी 1760 ईo को मल्हार राव होलकर ने सिकंदराबाद पर आक्रमण कर चौथ वसूल की और वहाँ डेरे डाल दिये। वहां उनको गुप्तचरों से खबर मिली कि गंगापार के रुहेलों का खजाना अब्दाली के डेरे की ओर जा रहा है।उसी के लिए वह वहां तीन चार दिन रुक गए। यही उनके लिए गलत हुआ और 4 मार्च 1760 ईo की रात्रि को सोते हुए मराठो पर अचानक अब्दाली के सेनापति जहान खां ने हमला कर दिया। जिससे मराठों को हानि उठानी पड़ी। मल्हार राव होलकर वहां से बच निकलने में कामयाब हो गए और सारोठी पहुंच गए।

अब्दाली भी अंदर अंदर मराठों से भयभीत था। 16 मार्च,1760 ईo को हाफिज रहमत अब्दाली का दूत बनकर मल्हारराव होलकर से सन्धिवार्ता के लिए मिला और 8 जून तक वार्ता चलती रही। उसी बीच उन्हें पता लगा कि 25 मार्च,1760 ईo को पेशवा के 22 वर्ष छोटे भाई सेनापति सदाशिव राव भाऊ और पेशवा के 16 वर्षीय पुत्र प्रधान सेनापति विश्वास राव के नेतृत्व में दक्षिण से पचास हज़ार की मराठा सेना आ रही है। इसीलिए सन्धिवार्ता भंग हो गई।

दक्षिण से आ रही मराठा सेना मल्हार राव होलकर के मार्गदर्शन में आगे बढ़ रही थी। मल्हार राव होलकर के प्रयास से सूरजमल जाट कुछ शर्तों के साथ मराठों का साथ देने को सहमत हो गया। 30 जून 1760 ईo को मल्हार राव होलकर के साथ सूरजमल जाट ,भाऊ से आकर मिले। वहां संभावित होने वाले युद्ध के लिए एक बैठक हुई। सदाशिव भाऊ ने कहा कि अब्दाली से एक जमकर युद्ध होना चाहिए।जबकि मल्हार राव होलकर ने कहा कि नहीं । हमें छापामार प्रणाली से युद्ध करना चाहिए। जो हमारे पुरखे लड़ते आए हैं । उससे मराठों की विजय अवश्य होगी। हमे भारी तोपें,भारी सामानों,असैनिकों,महिलाओ व बच्चो को चंबल नदी के पीछे या मथुरा के समीप किसी सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए। किसी कारण यदि हम सफल न हुए तो भी सुरक्षित निकल कर पुनः आक्रमण करने की स्थिति में होंगे। कठिन परिस्थिति में अपने को चुंगल में फंसाना कोई चतुराई नहीं होगी। सूरजमल जाट ने मल्हार राव होलकर की बात का समर्थन किया। उनके विचार सुनकर सदाशिव राव भाऊ भड़क उठा और क्रोध में बड़बड़ाते हुए ताना मारते हुए कहा-जब कभी हम या हमारे दूत इस मुल्क में आए, तब उन्होनें यह युद्ध का तरीका अपनाया होगा। हम नहीं अपनाएंगे और हम जमकर युद्ध लड़ेंगे। सूरजमल जाट एक जमींदार है। उसके विचार मेरे जैसे सक्षम व्यक्ति के लिए नहीं है।गंवार तथा जमींदार विकसित युद्ध कला से अनभिज्ञ है। भाऊ यही नहीं रुका और क्रोध उसने मल्हार राव होलकर की ओर इशारा करते हुए ताना मारते हुए कहा-बेकार मराठा सेना में 33% धनगर(गडरियों) को रखा हुआ है।मल्हार राव जी आप भी तो एक धनगर (गडरिया) हो। इससे 63 वर्षीय मल्हार होलकर जैसे अनुभवी सरदार का अपमान हुआ तथा उनकी अवज्ञा हुई। मल्हारराव होलकर और सूरजमल जाट यह कहते हुए बाहर निकले की- भाऊ के उग्र स्वभाव तथा उतावले पन के कारण उन पर कोई भयंकर विपत्ति आने वाली है । इस लिए वे अंदुरनी तौर पर खिंच गए।

मराठों ने दिल्ली पर 1 अगस्त,1760 ईo को अधिकार कर लिया ।नजीब खां का आदमी याकूब अली खां जान बचाकर भाग गया।अब्दाली यमुना नदी के दूसरी ओर खड़ा देखता रहा और कल्पना मात्र से सिहर उठा।अब्दाली ने शुजा के माध्यम से सूरजमल जाट को तोड़ने का प्रयास किया कि यदि आप मराठा पक्ष छोड़ कर चले जाएंगे तो आपको कोइल(रामगढ़),डिबाई,जलेसर परगना सौंपने का वचन दिया। उसी बीच धन की कमी के कारण से मराठों ने लाल किला की दीवाने खास की चांदी की छत उखड़वा कर भाऊशाही ,होलकरशाही, सिंधियाशाही सिक्के डलवाए गए। उस समय सूरजमल जाट को कोई और बहाना नहीं मिला तो वह कहने लगा कि मुगलों के शाही तख्त को इस तरह अपमानित नहीं करना चाहिए। इसी बहाने को लेकर वह अलग हो गया।ऐसा भी कहा जाता है कि वह अपने लिए दिल्ली मांग रहा था। उसकी मांग को मानने से भाऊ ने इन्कार कर दिया।उसी बात से नाराज़ होकर वह मराठों का पक्ष छोड़कर चला गया। मल्हार राव होलकर ने उसे रोकने का बहुत प्रयास किया ।लेकिन वह नहीं रुका। यह हिंदुस्तान का दुर्भाग्य ही रहा,जो मराठों के साथ कोई भी राजपूत, जाट आदि हिन्दू शक्तियां नहीं जुड़ी। जबकि अब्दाली के साथ सारे मुस्लिम नबाब,सुल्तान जुड़ गए।

दिल्ली का सूबेदार नारो शंकर को बनाकर मराठे आगे बढ़ना चाहते थे। परंतु सितंबर 1760 ईo को यमुना में बाढ़ आ गई। इसलिए अब्दाली के विरुद्ध अभियान नहीं किया जा सकता था। उसी बीच सितंबर के अंत में अब्दाली और शुजा ने सूरजमल जाट के पास खिलअत भेजी । उसको जाट राजा ने धारण की और अनेक प्रकार की शपथ लेकर मराठों की सहायता न करने का आश्वासन दिया।

16 अक्टूबर 1760 ईo को भाऊ, होलकर, सिंधिया आदि मराठो ने कुंजपुरा पर अधिकार कर निजाबत खां, अब्दुल समद खां, क़ुतुब शाह, गिलजाई, मोमिन खां आदि के साथ चार हज़ार अफगानों को मार डाला। 25 अकूबर को अब्दाली ने उत्तर की ओर रवाना होकर गौरी गांव के पास यमुना को पार करके वह 27 तारीख को सोनीपत पहुँच गया। कुरुक्षेत्र में मराठों को पता लगा कि अब्दाली ने जमुना नदी पार कर ली है और वह उनके पीछे है।
भाऊ ने सूपा के बाजी हरि को पांच हज़ार सैनिकों के साथ अब्दाली की गतिविधियों का पता लगाने भेजा। थकान उतारने के लिए मराठा सेना विश्राम कर रही थी। ठीक उसी समय अब्दाली के सेनापति शाह पसंद खां ने सोते हुए मराठों पर घात लगाकर हमला कर किया।उसमें मराठो को जान माल की हानि उठानी पड़ी।उससे मराठों का सम्पर्क दिल्ली से टूट गया। मराठे फिर वापिस मुड़े और 29 अक्टूबर 1760 ईo को पानीपत पहुँच गए।वहां पहुँच कर उन्हें पता चला कि उनके सात मील दक्षिण में अफगान सेना अब्दाली के नेतृत्व में खड़ी है। अब तो युद्ध होना अनिवार्य हो गया। मराठे दिल्ली और अफगान काबुल की ओर नहीं जा सकते थे।

पानीपत के मैदान में मराठे 45 हज़ार,15 हज़ार पिंडारी और 200 तोपे थीँ। असैनिकों जिनमें महिलाएं,बच्चे, सेवकों को मिलाकर एक लाख मराठे थे। जबकि अहमदशाह अब्दाली की सेना ने 60 हज़ार अफगान सैनिक थे और दूसरे दर्जे के 80 हज़ार सैनिक और भी थे।
पानीपत के मैदान में मराठो का मनोबल ऊंचा था। इसलिए वे अब्दाली के सैनिकों पर यदाकदा छापा मार- मार कर उन्हें नुकसान पहुंचाते रहे।मराठो को अपनी वीरता पर बड़ा भरोसा था और उन्हें आशा थी कि वे अब्दाली को अवश्य शिकस्त देने में कामयाब होंगे और अब्दाली, शुजाउद्दौला, नजीब खां रुहेला आदि सभी मारे जाएंगे। लेकिन अचानक स्थिति पलट गई। 7 दिसम्बर 1760 ईo को नजीब खां रुहेला की सेना से बलवंत राव मेहेंडले की भिड़ंत हो गई। जिसमें तीन हज़ार अफगान मारे गए और मराठों को भी हानि उठानी पड़ी।उसमे बलवंतराव मेहेंडले का बलिदान हुआ।
पानीपत के आसपास मुस्लिम आबादियां थीँ, जोकि मराठों के विरुद्ध थीं और वे अब्दाली की सहायता किया करती थीं। उन्होंने मराठों की रसद को रास्ते में ही लूटना शुरू कर दिया । जिससे मराठों के खेमों में रसद की भारी कमी होने लगी थी।कुंजपुरा किले में मराठों के अन्न के भण्डार थे। उस पर निजाबत खां रुहेला के पुत्र दिलेर खां रुहेला ने हमला कर अधिकार कर लिया था। गोविंद पंत बुंदेला जो मराठों को रसद भेज रहा था।अब्दाली के सेनापति अतार्क खां ने 20 दिसम्बर 1760 ईo को गाज़ियाबाद और मेरठ के बीच जलालाबाद में उस पर हमला कर उसे मार डाला। उससे पूर्व में16 और 17 दिसम्बर को यमुना नदी के पार रसद ले जा रही मराठा टुकडियों को पठानों ने मार डाला था। 22 दिसम्बर को कृष्ण राव बल्लाल एक लाख रुपए लेकर भाऊ तक पहुँच गया। परन्तु परासर दादा की रसद ले जाने वाली दूसरी टुकड़ी को 2 जनवरी 1761 ईo को अब्दाली ने काट डाला। मराठों डेरों में अनाज की भारी कमी के कारण बड़े बड़े सरदार और सेनापतियों के लिए भुखमरी की स्थिति हो गई।अब सदाशिव राव भाऊ अपनी करनी पर पश्चाताप कर रहा था कि उसने अपनी हठधर्मिता, घमंड और क्रोध के कारण वीर वृद्ध सरदार मल्हार राव होलकर की नेक सलाह को नहीं माना। उसने होलकर जैसे अनुभवी सरदार का अपमान किया ।उनकी सलाह मानता तो आज इस स्थिति में नहीं फंसते।सदाशिव राव भाऊ ने मल्हार राव होलकर से कहा- होलकर सरदार ।मैं आज तक आप पर संदेह करता रहा।आपकी बात ना मानकर ,आज पानीपत में हम सब फंस गए हैं। मुझे क्षमा करें। अब आप ही इस विकट परिस्थिति से मराठा सम्मान को बचा सकते हो।आप वचन दें कि युद्ध की विपरीत स्थिति में आप मराठा महिलाओं की रक्षा करना और उन्हें सुरक्षित निकाल कर ले जाना। मल्हार राव होलकर ने 500 चालाक फुर्तीले धनगरों अथवा गड़रियों को महिलाओं की रक्षा का भार सौंपा।जो विकट स्थिति में भी निकल सकने की चतुराई रखते थे। उस काल के वे कमांडो सैनिक थे। पानीपत युद्ध मे अन्य धनगर (गडरिये) मराठा सरदार भी खड़े थे।जिनमें मानाजी धायगुडे, रामराव खंडोंजी देवकाते,मलकोजी माने,यमाजी गोफने, रंगराव सिंगाड़े,यमाजी टकले, विट्ठल राव पांढरे,केरबा काले, नारायण राव पांढरे, गंगाजी शिंगाड़े, तुकोजी गाडवे, नरसिंह राव चोपड़े, आनंद राव माने, शिवाजी शेलके, धावजी माने, बिठोजी बुले,तुकोजीराव होलकर, संताजी वाघ आदि थे।

14 जनवरी 1761 ईo को बड़ा घमासान हुआ। सुबह 9 बजे से लेकर सायं 3 बजे तक युद्ध चलता रहा। मराठे प्रणोउत्सर्ग भी भावना से वीरता से युद्ध कर रहे थे। उन्होंने अफगानों के छक्के छुड़ा दिए।मराठों का वाम,दक्षिण तथा केंद्र पक्ष प्रथम कुछ घण्टों तक घोर युद्ध करते रहे। गार्दी ,रुहेला द्वंद,वजीर वली शाह से भाऊ साहब की टक्कर तथा मराठों के दक्षिण पक्ष से सिंधिया तथा होलकर के नजीब खां और शाह पर तीव्र प्रहार से मराठों की सुनिश्चित वीरता सिद्ध हो गई तथा उनके शत्रुओं की भारी क्षति तथा विनाश हुआ।मराठों ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए अब्दाली की सेना के दाएं,बाएं और मध्य भाग पर विजय प्राप्त कर ली थी ।अब्दाली की सेना मैदान छोड़कर भागने लगी । अब्दाली अपनी भागती ही सेना को रोकने का प्रयास कर रहा था। युद्ध होते होते 2 बज रहे थे।युद्ध की नाजुक स्थिति को देखकर अब्दाली ने 10 हज़ार की सुरक्षित सेना और 1500 जम्बूरकों को युद्ध में धकेल दिया । जो ऊंटों पर थीं।जम्बूरक छोटी तोप थी,जो आसानी से चारों ओर आसानी घुमाई जा सकती थी। ताज़ा दम जम्बूरकों ने थके मांदे मराठों पर हमला कर दिया।तभी अचानक एक सनसनाती हुई गोली विश्वास राव को आ लगी और उसकी मौत हो गई। उनकी मौत की खबर से मराठों का मनोबल टूट गया। उसी समय दो हज़ार मुस्लिम सैनिक जो मराठों की तरफ से लड़ रहे थे(एक षड्यंत्र के कारण कुछ समय पहले मराठों के साथ आ मिले थे) नेअचानक पहचान के लिए बांधी गई गेरुआ पट्टी को उतार फेंका और उन्होंने पीछे मुड़ कर मराठा ढेरों पर हमला कर दिया।
सदाशिव राव भाऊ अपने भतीजे विश्वास राव की मृत्यु को सह न सका और अपना आपा खो बैठा तथा उसने अपने अपनी सेनाओं की पंक्तियों को छोड़कर आगे बढ़कर पठानों पर टूट पड़ा तथा उनकी पक्तियों में जा घुसा और भाऊ मारा गया। भाऊ की मौत की खबर ने रहा सहा काम कर दिया। अपने सेनापति भाऊ और विश्वास राव की मृत्यु का समाचार सुनकर मराठे भागने लगे।उस भगदड़ का लाभ उठाकर पठानों ने मराठों का नरसंहार किया। इसमें लगभग एक लाख लोग मारे गए
मराठो ने वीरता की मिसाल पेश की और उन्होंने अब्दाली के चालीस हजार सैनिकों को भी मार डाला था। इसके बावजूद सैकडों मराठे बच भी गए और भरतपुर में पंहुचे और मल्हार राव होलकर के नेतृत्व में युद्ध की तैयारी करने लगे। अब्दाली यह खबर सुनकर सहम गया और जल्दी ही वह वापिस काबुल लौट गया।
यहां भरतपुर के सूरजमल जाट की प्रशंसा करनी आवश्यक है।उसने अतिथि भव का पालन करते हुए। मराठो को अपने यहां शरण दी और उनकी दावा दारू की।
धन्य है वीर बलिदानी ।जिन्होनें देश धर्म पर अपना बलिदान कर हिंदुस्तान के मस्तक को ऊंचा किया।

लेखक:- मधुसूदन राव होलकर
इतिहास लेखक
होलकरों का इतिहास

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